Tuesday, September 6, 2016

"बेख़ौफ़ कोइ रास्ता चलने के लिए दे"

"बेख़ौफ़ कोइ रास्ता चलने के लिए दे"

यह गरिमायुक्त छटपटाहट वाला संबोधन है 'दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे'
ये दरवाज़ा सुरक्षा बढ़ाने, बाहर से भीतर आने, घर में रमें रहने के लिए नहीं माँगा जा रहा है, इसे निकलने के लिए मांगा जा रहा है
पर निकल कर क्या करना है ?
क्या घर की सुरक्षित चहारदीवारी गयी तो रास्ते में सुरक्षा का दर घेर लेगा?
नहीं, शायर स्वतंत्रता का उत्सव मनाने के लिए क्षुद्रता तोड़ने का आव्हान कर रहा है 
बात है ऐसे रास्ते पर चलने की, जहां डर नहीं है.
"बेख़ौफ़ कोइ रास्ता चलने के लिए दे"
फिर एक अध्यात्म संस्कार वाला मन शायद इस शेर में शरण लेने वाली बात पकड़ ले
 क्योंकी शायर अपनी और से किसी खास रास्ते या विशेष ख्वाहिश को पूरा करने के लिए नहीं कह रहा है , 
उसमें श्रद्धा है की जिससे मांग रहा है 'बेख़ौफ़ रास्ता ', 
उसे मालूम है की किस रास्ते पर चलने मेरे लिए मुनासिब होगा 
"दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे बेख़ौफ़ कोई रास्ता चलने के लिए दे '
इस ग़ज़ल के दूसरे शेर में संकेत मिल रहा है की रास्ते का गंतव्य क्या है 'आँखों को अता
 ख्वाब किये शुक्रिया लेकिन, पैकर भी कोई ख्वाब में ढलने के लिए दे' 
एक vague और असपष्टता  लेकर काम नहीं बनता 
शायर ख्वाबों को ढालने के लिए सांचे की दरख्वास्त भी विराट से कर रहा है 
इस ग़ज़ल में शायर के सामने जीवन को सीमित सा करने वाली एक इकाई "काल" का भी बोध है 
वह देख रहा है किए वक्त को लेकर लोगों के पास कितनी शिकायतें हैं,
 वह देख रहा है काल को कोठरी बताने वाले काल की दीवारों से बार बार टकराते हैं 
टकराने का सबसे अधिक विकराल और हताशा वाला स्वरुप वह है
 जिसमें कोइ दीवार से अपना सर ही दे मारे 
वरना कोई हाथ से धक्का दे, लात मारे, 
सर दे मारना तो इंतहा है, 
जहां शायर निज़ाम साब स्वयं समयातीत से साक्षी से देख रहे हैं, 
ये पीढी , पिछली पीढी, आने वाली पीढी सब वक्त की दीवार से सर फोड़ रहे हैं ये जो जद्दोजहद है,
ये जो कश्मकश है -इसके समानान्तर कहीं कबीर सुनाई दे जाते हैं 
'फूले फूले चुन लिए, काल हमारी बार' 
ये जो कलियों की पुकार है, वही भाव भूमि इस शेर में मिलती हैं '
"सब वक्त की दीवार से सर फोड़ रहे हैं, रोज़न ही कोई भाग निकलने के लिए दे '
निज़ाम साब वक्त की दीवार से बाहर यानि कालबद्धता से पर ले जाने वाले 
छिद्र(रोज़न) की परिकल्पना जब पाठक के साथ बांटते हैं 
तो किसी सिरे पर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से निथार कर निकले मन की वाणी सुनाई देती है 
'सूली ऊपर सेज पिया की। ." वाले मीरा बाई की पंक्ति अलग परिवेश, भिन्न सन्दर्भ में उभर आती है 
'प्रेम दीवानी मीरा बाई के दर्द को कोइ जाना हैं,- हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय'
 कृष्ण ही जीवन था, जीवन की झांकी पाने, इसके विस्तृत स्वरुप को अपनाने की अकुलाहट
 शायर शीन कॉफ निज़ाम की रचनाओं में बार बार दिखाई देती हैं 
यदि मैं उन्हें आधुनिक युग का एक कुशल भक्त कवि कहूँ तो उन्हें भी शायद स्वीकार्य नहीं होगा 
वे चतुराई से अपने श्रद्धा प्रसूत संस्कारी मन को कला-कौशल के सूक्ष्म कलेवर से ढांप कर रखते आये हैं 
प्रेमी को इस तरह का दुराव -छिपाव प्रेम की पावनता को बरकरार रखने के लिए जरूरी लग सकता है 
ये कहना जरूरी है की शायर निज़ाम के लिए भारतीय परंपरा ज्ञान परंपरा है, 
सत्य के अन्वेषण के ऐसी परंपरा है जो हिन्दू संस्कार -संस्कृति तक ही महदूद नहीं,,
 उनके साथ उनकी बात को शिद्दत से समझने के लिए कहीं इस्लामी तहज़ीब के पारम्परिक कथानक
 एक नया आयाम उद्घाटित करते हैं 
तो ईसाई मत के आदम और हव्वा वाले बात भे इस ग़ज़ल के अंतिम शेर में आई है
 अपनी कल्पना शक्ति के लिए सृजन की सामर्थ्य की प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं 
'तखईल को तख़लीक़ की तौफीक अता कर 
फिर पहलू से एक चीज निकलने के लिए दे'
पहलू से एक चीज़ निकलने' वाले सन्दर्भ का मूल चाहे जो हो 
पढ़ने वाला इस अभिव्यक्ति में अपने लिए कुछ नया अर्थ बरामद कर सकता है. 
 यह universality जो पुराने सन्दर्भों को आधुनिक स्थितियों के अनुरूप न्यूनता प्रदान करते हैं 
-निज़ाम की शायरी की खूबी है
 और इस तरह उनकी शायरी हमारे लिए एक नित्य-नूतन धरोहर बन जाती है 
अशोक व्यास 

Wednesday, June 1, 2016

मारवाड़ी लघु हास्य कथा - टार्जन री काकी
लेखक - अशोक व्यास

पचे कई हुयो सा?
वे मने पूछ रिया हा
कई केवतो
की कोई हुयो
मजो कोनी आवतो
मैं कोणी बना दी
मैं केयो
"गाड़ी में ब्रेक कोई लागियो और घाटियों माते
तेज़ रफ़्तार ऊँ नीचे आवने लगी'
'मैं ब्रेक दबा रियो हो
पर गाड़ी रुक कोई रेई ही
मैं घबरा गियो
आज तो गया'

अबे हेंग जणा म्हारी बात ध्यान ऊ हुण रिया हा
पचे कई हुयो सा
'गाड़ी तो ठीक है ' म्हारो पक्को दोस्त पूछियो
क्योंकि मैं प्रशांत री गाड़ी लेने इज गया हो'

वो तो मजाक में पूछ लियो
बाकी जणा उन लारे पड़ गया'
'थने गाड़ी री चिंता है, दोस्त री फिक्र कोनी"
अबे हेंग जणा मने तो भूल गिया
प्रशांत केयो 'अरे मजाक कोई हमझो कई'

मजाक रो भी कोइ टेम हुए, मुकुल सा उन हमझावने लागिया
शैला जी चाय ले ने आया
ट्रे टेबल माते रखता बोलिया
'मजाक रे वास्ते भी कोइ पंडित जी ने पूछ ने मुहूर्त निकालना पडी कई'

गोविन्द जी पूछ्यो 'आप भी तो हाथे ईज हानी, गाड़ी में ब्रेक कोई लागियो जरे '

'किसी गाड़ी?'
प्रशांत री, माउंट आबू जाने आवता जरे

कुण गयो
'आप दोई गया हा नी'
'गया कोनी, जावता हा'
'पच्चे कई हुयो'
'ऐ बैठ गया , फेसबुक ले ने, केवे की 'ऑनलाइन राजस्थानी' रे वास्ते
एक कोणी लिखनी है'
"महोने तो खूब देर ऊँ, बिना लिखियों कोणी बणा बणा ने हुणा रिया है '

लक्ष्मण बोलियों, 'आपरी कोणी रो क्लाइमेक्स कई रेयो, गाड़ी भिड़ी के नहीं ?"

मैं केयो 'भिड़ती भिड़ती बच गी, टार्जन री काकी चाय ले ने आ गी"

शैला जी म्हणे देखता देखता
आँखियों ऊँ बोलिया 'करे गप्पों धरनी बंद करोला'

मैं उठ ने गुलदस्ते मू गुलाब रो फूल उठायो,
शैला जी ने देवणो नाटक करतो करतो केयो
"संसार गप्प ही है,
कुछ आप री, कुछ म्हारी
गप्पों धरण वाला इ ज इन संसार ने चला रिया है'

कुछ समझिया?
"बिलकुल' वे होंकरो भरियो
"कई"? मैं पूछ्यो तो जवाब मिलियो
"हमझी तो की नहीं, मैं तो गप्प मार रही ही'

टिमी भईसा कोणी माते 'दी एन्ड' रो बोर्ड लगावता बोलिया
"टार्जन री काकी गप्प लगावे जरे अच्छा अच्छा लोगो री कोणीयों
पूरी हूँ जावे'
 लक्ष्मण जी आपरी तरफ ऊँ पूंछ जोड़ी,
'अगर टार्जन री काकी टेम माते नहीं आवती, तो शर्तिया एक्सीडेंट हु जावतो'

Saturday, August 30, 2014

बात कुछ भी न हुई


वह एक अजीब सी उहापोह में फंसा था, सारा जीवन उसकी हथेली पर धरा था 
जिसमें उसे कभी सागर दिखाई पड़ता, कभी आकाश तो कभी जंगल, वो अपने आप में 
गुम था, पर उसे ऐसा कोई सिरा  नहीं मिल रहा था जहाँ से चल कर वो अपने आपको ढूंढ पाये 
उसने सोचों से थक कर सोचना छोड़ दिया 
वो अपने आप में बंद हो गया
 न कोई नया विचार 
न पुराने विचारों की कतार 
एक शून्य था 
शून्य जिसमें न जाने कैसे कोई एक चीख ठहर गयी थी 
और यह चीख रह रह कर उसे छू जाती 
अब उसने अपना सारा ध्यान इस चीख के पीछे छुपी कहानी को सुलझाने में लगा दिया 
वह शांत होकर इस चीख का रंग रूप देख रहा था 
अब उसे लगा चीखें भी कितनी मासूम होती हैं 
इनके भीतर एक भोलापन होता है 
नासमझी का शिकार ये चीख न जाने कैसे धीरे धीरे उसके साथ
 ध्यान मगन होने का खेल खेलते खेलते 
सुन्दर और मधुर हो चली थी 
अब उसे साफ़ दिख रहा था इस चीख का बीज उसने वहां से उठाया था  
जहा उसे अपने चेहरे में भ्रम की परछाई दिखाई दे रही थी 

चीख ने खुद कहा मैं तुम्हारा सच नहीं हूँ 

तुम अपने सत्य के साथ होकर कितने बलशाली और गौरवशाली हो जाते हो 

चीख ने यह कह कर उसे प्रणाम किया 
वह मौन के अनंत शिखर में सम्माहित हो गया 

बात कुछ भी न हुई पर कुछ बन गया 
दिखाई कुछ भी न दिया पर वह संवर गया 
अपने नए रूप के साथ जब उसने आँखें खोली 
तो सारी दुनिया को बदला हुआ पाया 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० अगस्त २०१४ 

Saturday, August 16, 2014

सूरज का अंश


लिख कर कोई पुरस्कार थोड़े ही मिलना है, लिख कर कोई पैसे थोड़े ही कामना है" कुछ इस तरह की बातें उसके पास कई बार सुनने को मिलती थी 
आज वो नहीं है 
उसके शब्दों में जो स्पंदन हैं, उन शब्दों में उसकी धड़कने अब भी सुनाई देती हैं, तो क्या लिख लिख कर वो अपने लिए अमर होने के द्वार खोल रहा था? मैंने सोचा और उसकी पुरानी डायरी में उसके हाथों लिखी ये कहानी दिखाई दी, जिसका अंत निष्कर्षात्मक था 
"वो जब पहाड़ की छोटी पर पहुंचा तब उसके मन में अपूर्व शांति थी, उस शांति की सघन अनुभूति लेकर वह 
वहीं बैठ गया, सूर्यास्त होने से पहले क्षितिज पर ललाई का खेल उभर रहा था, रंगों के बीच सामंजस्य बिठाने वाले की कला पर मुग्ध वह मुस्कुराया।
पहाड़ से नीचे उतरते हुए उसे लगा, जो दीखता है वह सच नहीं होता, सूर्यास्त होते दिखाई देता है पर सूरज हमेशा बना रहता है, कभी अस्त नहीं होता, मैं भी कभी अस्त नहीं होने वाला हूँ क्योंकि मैं सूरज का अंश हूँ"

मैं उसके शब्दों में झनझनाते जीवन की तरंगों के स्पर्श से तन्मय हो चला था 
डायरी बंद करके जब अपने चारों और देखा तो बोध हुआ शाम हो चली थी, यही वो वक्त था जब अक्सर सुधांशु के कदम मेरे कमरे की ओर बढ़ते थे, घंटी थी, पर उसे द्वार खटखटाना ही अच्छा लगता था, कारण पूछने पर उसने बताया की संवाद के द्वार खोलते हुए वो इलेक्ट्रिसिटी को बीच में नहीं लाना चाहता, दरवाजे पर दस्तक देने वाले मेरे हाथ द्वारा उत्पन्न ध्वनि में मेरा जीवन सीधे सीधे तुमसे जुड़ता है 
मैं चाहता हूँ, जीवन जीवन से जुड़े बिना किसी कृत्रिमता के. उसे दरवाजा खटखटाना घंटी बजाने की अपेक्षा अधिक शुद्ध लगता था, इस बात पर मित्रों के बीच मैंने भी उसका मजाक बनाया था पर आज मेरे कान उसकी दस्तक का स्वर सुन रहे थे जिसने लिखा था 'मैं कभी अस्त नहीं होने वाला हूँ "

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१६ अगस्त २०१४ 

Saturday, June 21, 2014

मन को द्वारका बनाओ


देखा साई ने 
टटोल कर 
टूट-फूट के लिए 
मुखरित होने का माध्यम 
मुझे बनाने से पहले 
कर दिया पक्का 
करूणामय नैनों से छूकर 

"तू चुप रहेगा 
तभी मैं बोलूंगा 
चुप होते ही 
मिल गई शांति 
शांत आनंद पूछ बैठा 
"कब बोलोगे साईं ?"

साईं बोले 
"तू अभी तक बोलता है 
बोल मत 
सौंप कर तन-मन मुझे 
सुन 
सिर्फ सुन 
बोल फूटेंगे अपने आप 
मेरे स्पंदन से 
तुझमें,
जब भी 
जो भी 
देख उन्हें 
सुन अपने आपको 
ऐसे की जैसे 
सुन रहा हो मुझे 

जय श्री कृष्णा 
मार्च ११, २००४, साईं मंदिर, न्यूयार्क 

"आग्रह छोड़"
कहा साईं ने 
आग्रह 
छल है प्राप्ति का 
मुक्ति निरागृह में है 
आकाश का टुकड़ा 
मत मांग 
तेरा ही है पूरा आकाश 
साईं चिकित्सक है 
चीर कर ग्रन्थियां 
स्वस्थ करता है 
बुलाया साईं ने "ला हाथ पकड़ मेरा 
चलते-चलते हाथ पकड़ कर साईं का 
किस क्षण 
चलना उड़ना हुआ 
पता ही न चला 

उड़ते उड़ते 
चुपचाप जब 
पूछा साईं ने 
"कहाँ जाना है"
मन बोला "कृष्ण दरस को द्वारका"
हंस कर कहा साईं ने 
"कृष्ण तुम्हारी चेतना है ,
मन को द्वारका बनाओ 
कृष्ण को पाओ 
और हाँ 
अगर अपना मन 
तुम मेरे पास लाओगे  तो 
तुम्हारे मन को 
द्वारिका मैं बनाऊंगा 
आश्वस्त रहो"
जय श्री कृष्ण


अशोक व्यास 

रस यात्रा


"रस कैसे आये जीवन में?',
 सारे देशों के कलाकार मिल कर 
इस विषय पर विमर्श कर रहे थे.
 कुछ ने कहा "भोजन में ही रस है"
कुछ ने बताया 'सुंदरता में रस है "
"वनस्पतियो में रस है "
"रस है कल्पना में "
फिर एक ने पूछा, 
"ये रस है क्या ?"
किसी ने कहा "रस माने आनंद"
"आनंद तो श्रद्धा और प्रेम से ही आएगा"
"प्रेम कहाँ से आये ?"
"प्रेम तो हमारे भीतर है "

"पर हमारे भीतर तो नफरत भी है "
एक ने कहा 
"रस वो है 
जो हमारे भीतर के प्रेम को प्रकट करवाये "
इससे सब सहमत हो गए 
२ 
लोग अपने-अपने देश लौट गए 
प्रयोगशालाओं में ऐसे रस का विकास किया गया
 जिससे प्रेम प्रकट हो "
सबने उस "रस" पर अपनी अपनी संस्कृति ,
 अपने अपने देश की छाप लगा दी 
 अगली बार "रस यात्रा " का सम्मलेन हुआ तो उसे "शांति सम्मलेन" कहा गया 
सब अपने अपने देश से लाये गए "प्रेमवर्धक रस" की महिमा गाते रहे 
खींचतान में रस का असर जाता रहा 
शांति का संगीत अहंकार और अधिकार की थाप में खो गया 

४ 
पेड़ों के नीच बैठे मौनधारियों ने सुना
 विश्व सम्राट ने सभी को रस उत्पादन की विशिष्ट क्षमता दी है 
ऊंचे पहाड़ों पर गुफाओं में बैठे मनस्वियों ने सुना 
"प्रेम किसी एक की बपौती नहीं है "
हवाओं ने  सन्देश सुनाया "हर मनुष्य विशिष्ट है "
जीवन का लक्ष्य है 
"रससृष्टि करो
प्रेमवृष्टि करो 
आनंद हो अनवरत 
ऐसी दृष्टि करो"

अशोक व्यास, 
न्यूयार्क, अमेरिका 


(लिखा गया , ८  दिसंबर २००८, फ्लशिंग, न्यू यॉर्क स्थित 
की फ़ूड के बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा करते हुए)

Tuesday, April 1, 2014

April Fool Day


नमस्कार 
मैं हूँ अशोक व्यास 
आप देख रहे हैं 
इनसाइट टुनाइट 

इनसाइट जो होती है वो दिखाई नहीं देती 
हम जो हैं, वो भी दिखाई नहीं देता 

और कई बार जो कहाजाता है 
वो सुनाई कुछ देता है 

और उसका आर्थ कुछ और होता है 

जैसे किसी ने मुझे कहा 
"अशोकजी अगर आपको कोइ मूर्ख कहे 
तो आप बुरा मत मानना 
गुस्सा मत करना 
कहने वाले के पीछे मत पड़ना 
बस शांति से बैठना 
केमरे से नज़र मिलाना 
और 
सोचना 
शांति से सोचना 
कि यार इसको पता कैसे चला '


आज हम पहली अप्रैल मना रहे हैं 
गीत मुखड़ा - अप्रैल फूल
इस दिन को कुछ लोग केजरीवाल दिवस के रूप में भी मना रहे हैं 

एक 'अखबार' फेकिंग न्यूज़ लिखता है 

New Delhi. Taking precautionary measure to avoid any possible confusion, AAP supremo Arvind Kejriwal has decided to not call anyone corrupt on April Fool’s Day.
Kejriwal’s deafening silence caught media attention after no verbal attacks on BJP, Congress, Ambani, and Adani by him were recorded since this morning.
Kejriwal Silent
Trying to keep his mouth shut.
When asked about the reason of this surprising silence, Kejriwal clarified, “No matter what you say, people don’t take you seriously on 1st of April. So better not to make such sensitive allegations on 1st April, as people might confuse it with prank.”
“For today, all politicians are honest, no media is paid, and I am an idiot. It’s one of those rare days when sun rose from the west,” quipped Kejriwal.
However, sources reveal that it all started last midnight when Kejriwal, while having a chat with his close aide, reiterated his famous dialogue, ‘Sab mile huye hain’, following which his aide started laughing as he was reading April Fools’ Day jokes on Twitter at the same time.
It was then Kejriwal decided to keep his mouth shut for the whole day.
As per political experts, it’s a much required break which Kejriwal needed to maintain his high spirits. “He has been playing this blame game recklessly for last few months. This break is going to detoxicate him,” explained a political analyst.
This is the first day since Kejriwal formed his party when he will be spending 24 hours without calling rival politicians and big businessmen corrupt and thief.
Even Kejriwal accept the fact that, it’s not going to be easy for him to pass a whole day just like a normal person. “It’s like navrata fasting and I am really not habituated to this,” Kejriwal told Faking News.
Reportedly, Kejriwal was feeling very suffocated in the morning.
“To keep himself at peace, he yelled at the chair and table of his room and called them Ambani agents. He was looking very relaxed after that!” disclosed an aide.

और आज फर्स्ट अप्रैल को समर्पित इस विशेष कार्यक्रम में कुछ समझदारी के सवाल हैं
जो हैं तो आपके लिए
पर हमारे स्टूडियो में बैठे अतिथियों को लगेगा कि ये उनके लिए ही हैं
तो इनसे आपका परिचय करवा दिया जाए



एक्चुअल सवाल की तरफ बढ़ने से पहले पहला सवाल
१- मूर्ख और समझदार में क्या फर्क होता है

२ मूर्ख बनाना आसान है या मूर्ख बनना

३ अगर मूर्ख दिवस पर किसी के नाम करने का अधिकार मिले तो
ये दिन आप अपने अलावा किसके नाम करना चाहेंगे

और अब याद करें फ़िल्म इश्क़
इसमें एक चेहरा था 'आमिर खान' का
जिन्होंने इलेक्शन कमीशन को कहा कि वो आम आदमी पार्टी को समर्थन नहीं कर रहे हैं
और पार्टी उनके चेहरे का प्रयोग कर रही है
NOW CAREFULLY LOOK AT THIS QUESTION AND TELL ME
WHICH ANSWER IS CORRECT
1
AMIR KHAN'S FINAL EPISODE OF 'SATYMEV JAYTE' SHOW, SHOWN ON 1ST APRIL
TALKED ABOUT IMPORTANCE OF VOTING RIGHTS,
THERE IS DEEP PHILOSOPHY BEHIND THIS
IN ELECTION PROCESS LEADERS FOOL VOTERS AND VOTERS FOOL LEADERS

AAJ KA PEHLA SAWAAL SAMBANDH RAKHTA HAI IS GEET SE

JO HAM TAK पहुँचा फ़िल्म '३ इडियट्स' में
"आल इस वेल"

सवाल है


WHO IS THE CHAIRMAN OF THE COMMISSION, WITH $5MILLION
GRANT TO FIND WHETHER EGG CAME FIRST OR HEN?

A, AMIR KHAN
B, ARVIND KEJRIWAL
C. ANIL KAPOOR
D. MR. APRIL FOOL



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आज हम अप्रैल फूल दिवस मना रहे हैं
इसका बड़ा लम्बा इतिहास है

एक पति ने अपनी पति से कहा
सुनती हो, आजकल तुम पहले से और अधिक खूबसूरत होने लगी है
पत्नी रसोई में रोटियां बना रही थी,
उसने पूछा 'आज तुम्हे ये अहसास कैसे हुआ'
पति ने कहा, देखो तुम्हें देख कर रोटियां भी जलने लगी हैं

कुछ लोग जलते हैं
कुछ लोग जलाते हैं
बात १९७६ की है
 कुछ लोग बनते हैं
कुछ बनाते हैं

  • Jovian-Plutonian gravitational effect: In 1976, British astronomer Sir Patrick Moore told listeners of BBC Radio 2 that unique alignment of two planets would result in an upward gravitational pull making people lighter at precisely 9:47 am that day. He invited his audience to jump in the air and experience "a strange floating sensation". Dozens of listeners phoned in to say the experiment had worked,[6] among them a woman who reported that she and her 11 friends were "wafted from their chairs and orbited gently around the room.[7]
  •  
  • कहावत है, नहले पे दहला 
  • शेर को सवा शेर 
  • अगले सवाल की तरफ बढ़ने से पहले याद करें फ़िल्म आनंद का ये दृश्य जिसमें राजेश खन्ना मुरारी लाल कह कर सबसे मिल जुल लेते हैं 
  •   
  • किसी से मिलने के बाद बात चीत की शुरुआत कैसे की जाए,
  • what is your pick up line? 
  • A NEW BOOK TRACES PICK UP LINES OF
    MAJOR INDIAN POLITICIANS, WHO IS THE AUTHOR?
    1. ARUNDHATI ROY
    2. ARUN SHOURIE
    3. MADHU KISHWAR
    4. MR APRIL FOOL
    EXAMPLES



  • Are your legs tired? (No why?) Because you've been running through my mind all night- KEJRIWAL
  • Do you have a map? 'Cause I just got lost in your eyes.- RAHUL GANDHI
  • I'm trying to rearrange the alphabet so that U and I are together.- MODI

    • QUESTION-
    • HOW PRESENCE OF SOCIAL MEDIA CHANGING THE LITERATURE OF PICK UP LINES?
    • 2 IS 1ST APRIL THE RIGHT DAY TO GO FOR A FIRST DATE?
    • 3. FOOLS ARE MADE IN HEAVEN OR AT HOME?
    •  
    • REMINDED OF ONE MORE SONG BY 'AMIR' THAT HAS A MUMBAIYA TOUCH
    • IN ITS PICK UP LINE?
    • AATI KYA KHANDALA
    •  
    •  
    • Canadian three-dollar coin: In 2008, the CBC Radio program As It Happens interviewed a Royal Canadian Mint spokesman who broke "news" of plans to replace the Canadian five-dollar bill with a three-dollar coin. The coin was dubbed a "threenie", in line with the nicknames of the country's one-dollar coin ("loonie" due to its depiction of a common loon on the reverse) and two-dollar coin ("toonie").[13]
     

  • Taco Liberty Bell: In 1996, Taco Bell took out a full-page advertisement in The New York Times announcing that they had purchased the Liberty Bell to "reduce the country's debt" and renamed it the "Taco Liberty Bell". When asked about the sale, White House press secretary Mike McCurry replied tongue-in-cheek that the Lincoln Memorial had also been sold and would henceforth be known as the Lincoln Mercury Memorial.[18]
  •  
  •  HERE IS THE QUESTION

  • THE LOGO OF RAKHI SAVANT'S POLITICAL PARTY IS
  • A. RED CHILLY
  • B. GREEN CHILLY
  • C.ANGAN KEE KALI
  • D.  APRIL FOOL

  • 1
    • Associated Press were fooled in 1983 when Joseph Boskin, a professor of history at Boston University, provided an alternative explanation for the origins of April Fools' Day. He claimed to have traced the practice to Constantines' period, when a group of court jesters jocularly told the emperor that jesters could do a better job of running the empire, and the amused emperor nominated a jester, Kugel, to be the king for a day. Boskin related how the jester passed an edict calling for absurdity on that day and the custom became an annual event. Boskin explained the jester's role as being able to put serious matters into perspective with humor. An Associated Press article brought this alternative explanantion to public's attention in newspapers, not knowing that Boskin had invented the entire story as an April Fool's Joke itself, and were not made aware of this until some weeks later.[20]

    Questions for panelist

    1 what is the difference between a fool and a kool?

    2. Do our company makes us smart?

    3. Are all people with smart phone smart?

     

    चलते चलते एक गीत 

    मेरी पत्नी मुझे सताती है 

    ये घोषणा कर करके कौन किसे अप्रैल फूल बनाता रहता है 

    इसका निर्णय आप पर 

    अप्रैल फूल का दिन एक रिमाइंडर है 

    कि ज़िन्दगी को बहुत ज्यादा गम्भीरता से न लें 

    और