Tuesday, March 12, 2013

जो नहीं हैं अब


१ 
कुछ दिनों से अक्सर यूं होता रहा। पूजा करते करते यूं लगता जैसे कोइ पीछे खड़ा होकर देख रहा हो. 
पलट कर देखने पर कोइ दिखाई नहीं देता, पर ये अनुभूति की अभी अभी यहाँ कोइ था, बड़ी पक्की थी 
इतनी पक्की की इसकी चर्चा औरों से भी की, यह प्रश्न भी उछल आया की कहीं मेरा दिमाग अपना संतुलन तो नहीं खो रहा है 
इस तरह लगने की बारम्बारता इतनी अधिक मात्रा में, इतनी जल्दी पहले कभी हुयी न थी 
पर ये लगता था, की यह उपस्थिति जो मेरा ध्यान चाह रही है या मुझ पर ध्यान रख रही है, भली सी है,
मेरा नुक्सान नहीं करना चाहती वरन मेरे साथ इसका कोइ आत्मीय सम्बन्ध है 
यह भाव इतना प्रगाढ़ था की जैसे मैं इसे छू सकता हूँ, लगभग हर दिन, शायद दो या तीन सप्ताह से, इस तरह की अनुभूति की कोइ अदेखा, अशरीरी पर 'जाग्रत बोध' मेरी और समय समय पर देखता है 
अपनी दफ्तर में दो मित्रों से बात की की क्या उन्होंने ऐसा कभी अनुभव किया है, वे समझ ना पाए की मैं या कह रहा हूँ, अपनी पुत्री से भी इसकी चर्चा की, उसका कहना था कहीं मैं 'hallucinate' तो नहीं कर रहा हूँ, हम दोनों  'भूत' की सम्भावना उछाल कर भी मुस्कुराए . मैंने फिर कहा, ये उपस्थिति डराने वाली नहीं,
मैत्री पूर्ण है, पर क्यूं है, इसके बारे मैं कुछ पता नहीं चल रहा था 
उस दिन खुल कर बात होने के बाद मुझे लगा अब शायद वो उपस्थिति फिर से मेरी सजगता के घेरे में ना आये, पर ऐसा हुआ नहीं, अगले दिन भी पूजा कक्ष के ठीक बाहर से, जैसे कोइ मेरी और देखता प्रतीत हुआ 
पलट कर देखने पर कोइ दिखाई न दिया 

२ 
परिवार में एक मुखिया के परलोक गमन का अवसाद उस स्थल से दूर रह कर इस बात को 
खबर की तरह प्राप्त करने वालों के लिए बड़ा 'unreal' सा हो जाता है
उसकी वो तस्वीरें साथ होती हैं, जब वो जीवन की गरिमा का मधुर रस छलकाता था
उसकी सोच, उसके भाव और नन्हीं नन्ही बातो से जीवन का सौन्दर्य पान करने
वाली ललक का पुनरवलोकन करना उसकी उपस्थिति को सघन कर देता है
स्वीकार करने का क्रम, सबके लिए अलग अलग होता है, रह रह कर रुलाई सी फूटती है
उसमें प्यार और विवशता के साथ जीवन चक्र को समझते हुए भी न समझ पाने की कसक होती है
यादों की जानी पहचानी गलियों में बार बार यात्रा करके हम उस 'एक' अनाम कुछ को
बचाए रखने का प्रयास करते हैं .
जीवन के पार है क्या, यह प्रश्न भी उठ खड़ा होता है, ऐसे ही प्रश्न उठाती बिटिया ने कहा
'काश उन्हें ठीक से विदा तो कह पाती'?



इस यात्रा के साथ जो अनिश्चय है, वह जीवन के सौन्दर्य को बढाता है
हम जितना कुछ अपनी इन्द्रियों से जान पाते हैं, जिस तरह से जन्म मृत्यु का खेल अपनाते हैं,
इस खेल को बनाने वाला इन से परे है और इन्द्रियों के द्वारा समझ नहीं जा सकता 

उसी तरह सूक्ष्म स्तर पर घटित होने वाली घटनाओं का स्थूल जगत में
सर्वमान्य explanation हो नहीं सकता


आज सुबह 'अशोकजी' के स्वर को सुनते हुए आँख खुली,
जैसे कोइ दरवाजे के बाहर घंटी न बजने पर
आवाज दे रहा हो, स्वर बहुत स्पष्ट था, उठ गया,
पर ये भी स्पष्ट था की आवाज कहीं बाहर से नहीं आई, अपनी भीतर
से ही आई है
और उठते उठते जैसे किसी पहेली का हल सा मेरे सामने खिल गया
बिटिया के प्रश्न में इसकी कुंजी थी
शायद वो ही आये थे, अपनी और से विदा कहने, उस भली सी उपस्थिति के रूप में,
वह एक बोध, क्या उनकी ही चेतना का 'परावर्तन' था
जो नहीं हैं अब, देह रूप में।




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
1२ मार्च २ ० १ ३