Saturday, June 21, 2014

मन को द्वारका बनाओ


देखा साई ने 
टटोल कर 
टूट-फूट के लिए 
मुखरित होने का माध्यम 
मुझे बनाने से पहले 
कर दिया पक्का 
करूणामय नैनों से छूकर 

"तू चुप रहेगा 
तभी मैं बोलूंगा 
चुप होते ही 
मिल गई शांति 
शांत आनंद पूछ बैठा 
"कब बोलोगे साईं ?"

साईं बोले 
"तू अभी तक बोलता है 
बोल मत 
सौंप कर तन-मन मुझे 
सुन 
सिर्फ सुन 
बोल फूटेंगे अपने आप 
मेरे स्पंदन से 
तुझमें,
जब भी 
जो भी 
देख उन्हें 
सुन अपने आपको 
ऐसे की जैसे 
सुन रहा हो मुझे 

जय श्री कृष्णा 
मार्च ११, २००४, साईं मंदिर, न्यूयार्क 

"आग्रह छोड़"
कहा साईं ने 
आग्रह 
छल है प्राप्ति का 
मुक्ति निरागृह में है 
आकाश का टुकड़ा 
मत मांग 
तेरा ही है पूरा आकाश 
साईं चिकित्सक है 
चीर कर ग्रन्थियां 
स्वस्थ करता है 
बुलाया साईं ने "ला हाथ पकड़ मेरा 
चलते-चलते हाथ पकड़ कर साईं का 
किस क्षण 
चलना उड़ना हुआ 
पता ही न चला 

उड़ते उड़ते 
चुपचाप जब 
पूछा साईं ने 
"कहाँ जाना है"
मन बोला "कृष्ण दरस को द्वारका"
हंस कर कहा साईं ने 
"कृष्ण तुम्हारी चेतना है ,
मन को द्वारका बनाओ 
कृष्ण को पाओ 
और हाँ 
अगर अपना मन 
तुम मेरे पास लाओगे  तो 
तुम्हारे मन को 
द्वारिका मैं बनाऊंगा 
आश्वस्त रहो"
जय श्री कृष्ण


अशोक व्यास 

रस यात्रा


"रस कैसे आये जीवन में?',
 सारे देशों के कलाकार मिल कर 
इस विषय पर विमर्श कर रहे थे.
 कुछ ने कहा "भोजन में ही रस है"
कुछ ने बताया 'सुंदरता में रस है "
"वनस्पतियो में रस है "
"रस है कल्पना में "
फिर एक ने पूछा, 
"ये रस है क्या ?"
किसी ने कहा "रस माने आनंद"
"आनंद तो श्रद्धा और प्रेम से ही आएगा"
"प्रेम कहाँ से आये ?"
"प्रेम तो हमारे भीतर है "

"पर हमारे भीतर तो नफरत भी है "
एक ने कहा 
"रस वो है 
जो हमारे भीतर के प्रेम को प्रकट करवाये "
इससे सब सहमत हो गए 
२ 
लोग अपने-अपने देश लौट गए 
प्रयोगशालाओं में ऐसे रस का विकास किया गया
 जिससे प्रेम प्रकट हो "
सबने उस "रस" पर अपनी अपनी संस्कृति ,
 अपने अपने देश की छाप लगा दी 
 अगली बार "रस यात्रा " का सम्मलेन हुआ तो उसे "शांति सम्मलेन" कहा गया 
सब अपने अपने देश से लाये गए "प्रेमवर्धक रस" की महिमा गाते रहे 
खींचतान में रस का असर जाता रहा 
शांति का संगीत अहंकार और अधिकार की थाप में खो गया 

४ 
पेड़ों के नीच बैठे मौनधारियों ने सुना
 विश्व सम्राट ने सभी को रस उत्पादन की विशिष्ट क्षमता दी है 
ऊंचे पहाड़ों पर गुफाओं में बैठे मनस्वियों ने सुना 
"प्रेम किसी एक की बपौती नहीं है "
हवाओं ने  सन्देश सुनाया "हर मनुष्य विशिष्ट है "
जीवन का लक्ष्य है 
"रससृष्टि करो
प्रेमवृष्टि करो 
आनंद हो अनवरत 
ऐसी दृष्टि करो"

अशोक व्यास, 
न्यूयार्क, अमेरिका 


(लिखा गया , ८  दिसंबर २००८, फ्लशिंग, न्यू यॉर्क स्थित 
की फ़ूड के बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा करते हुए)