Thursday, October 31, 2013

HORROR वाला SCENE है



मामला संगीन है 
HORROR  वाला SCENE है
भूत भैय्या जाग गए 
आया HALLOWEEN है 


खूनी खूनी पंजा भी 
लगता Clean Clean है 
Dark Dark आँखें हैं 
दीखता बड़ा Mean है 

डरने का Drama है 
साँप लिए बीन है 
भूतों की दावत है 
आया HALLOWEEN है 

FEAR की Machine है 
FALL वाला Green है 
GHOST जी रोमांस करें 
आज HALLOWEEN है 


ASHOK व्यास

Sunday, October 20, 2013

अधूरी कहानी बंद करो


इस बार तो पूरा मोहल्ला उसके घर के बाहर नारे बाज़ी करने चला आया था, उनके हाथों में तख्तियां भी थीं,
जिन पर नारे लिखे थे, कुछ लोग जोर जोर से उन नारों का सामूहिक स्वर में उच्चारण भी कर रहे थे 
"बंद करो', "बंद करो, अधूरी कहानी बंद करो'
सबके साथ आये शिष्ट मंडल में से चार लोग उससे बात करने आगे आये तो वो भी शिष्टता के साथ उनकी सुनने लगा. सबको शिकायत थी की वो इतनी अच्छी कहानियां लिखता है पर उन कहानियों में अंत तो होता ही नहीं, बस्ती वालों की शिकायत थी की अधूरी कहानियों के कारण कई लोगों की नींद उड़ गयी है और बस्ती में एक तरह की उदासी है, उस उदास लहर के लिए सब उसे ही दोषी ठहरा रहे थे 

२ 

उसे समझ में नहीं आ रहा था की वो अपनी सफाई में क्या कहे 
कुछ भी कहने के बजाये उसने कहा 'इस बार वो उनके लिए एक पूरी कहानी लिखेगा'
उनके चेहरे पर तसल्ली थोड़ी ही देर रही, क्योंकि उसने पूछा, पूरी कहानी के योग्य 
कोइ पूरा व्यक्तित्व उसे बताने का ज़िम्मा बस्ती वालों को 

३ 

सब सोचने लगे तो हर किसी में कमियां दिखाई दी 
हार मानते मानते शिष्ट मंडल के एक सदस्य ने कहा, कहीं में कल्पना का प्रयोग भी तो किया जा सकता है 
ठीक है, मैं प्रयास करूंगा 
उसने कहा 
फिर पूरे चौदह बरस तक उसने कोइ कहानी नहीं लिखी 

इस बार जब उसके कलम चलने लगी  तो बस्ती में चर्चा हुई, शायद उसे कोइ पूरा व्यक्तित्व मिल गया है 
सब अधीरता से उसकी कहानी की प्रतीक्षा कर रहे थे 

जिस दिन कहानी  नदी में उतरी तो दूर दूर तक खुशबू फ़ैल गयी 
कहानी की कोइ नापी तुली संरचना नहीं थी, इसमें लचीलापन था 
हर किसी को इस कहानी में अपना अक्स दिखलाई दे रहा था 

४ 

लोग प्रतिक्रिया करने में संकोच कर रहे थे 
पर चर्चा के केंद्र में उसकी कहानी ही थी 

कहानी उत्सव में उसने मंच से कहानी का रहस्य प्रकट करते हुए कहा 
"इस कहानी का अपना कोइ आग्रह नहीं, यह एक तरह से निराकार को आकार देने की 
कोशिश है और इस कहानी का विस्तार देखने वाली की दृष्टि का सहारा लेकर अपनी सीमा को निर्धारित करता है, इसमें कुछ ऐसे पात्र हैं जो पूरी खुले पण से विभिन्न दृष्टियों के सांचे में ढल लजाने को प्रस्तुत हैं'

ये पात्र उसे कहाँ मिले, जब दर्शकों ने ये प्रश्न उठाया तो वह मुस्कुराया, चौदह साल के वनवास के बाद 
ये पात्र राम के साथ अयोध्या लौटे थे 
और काल की सीमाओं को लांघ कर मेरे पास राम का सन्देश लेकर आये'

और राम का सन्देश क्या है ? पछा गया तो वह फिर एक कोमल मुस्कराहट के साथ बोल "राम का सन्देश सुनने सुनाने के लिए हमें अपने सीमित आकारों से परे की चेतना को स्वीकार करना आवश्यक है'

मेरी कहानी उसी चेतना का आव्हान करने का एक विनम्र प्रयास है 

तालियों की गडगडाहट से बस्ती का सभागार गूँज उठा 
सबने नए सिरे से पूरे कहानी के स्त्रोत को जान लिया 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२० अक्टूबर २०१३ 

Thursday, August 8, 2013

कहानी -एक मंगल उत्सव

कहानी 


कहानी ने उसे वहां ढूँढा जहाँ उसने ये मान लिया था की वो सबकी पहुँच से परे आ गया है 
पहले तो सूर्य की एक किरण अचानक आकर उसके भाल पर तिलक कर गयी 
उसके भीतर के उजियारे ने जैसे बाहरी जगत के उजियारे से एक मान्यता पाई हो 
फिर कहानी ने उसकी स्मृतियों का हाथ पकड़ कर उसे ऐसे काल में उतरना सिखाया 
जहाँ उतर कर लौट न पाने के डर से वो पहले कभी गया नहीं था 
एक वो कुआँ था, जिसमें उसकी क्षुद्र कामनाएं छुप कर रहती थीं 
उसे भय था वहां जाने पर वे फिर उसे घेर लेंगी 
पर ऐसे हुआ नहीं 
सब कामनाओं का स्वरुप बदल गया था 
उनके भीतर अब उसे ममता की झलक दिखाई दी 
हमने तुम्हारा साथ तुम्हारे कल्याण और आत्म -विकास के लिए ही किया था 
तुम हमें अपनी करुनामय दृष्टि से देख कर मुक्त करों 

अपने ही अतीत से झांकती क्षुद्र कामनाओं से यह प्रार्थना सुन कर 
वह आश्चर्यचकित था 
उसने सहज प्रेम, विनम्रता और श्रद्धा के साथ उनकी और देखा 
कामनाएं उसके देखते देखते कुएं से लुप्त होने लगीं 
उजियारे विस्तार अपनी प्रफुल्लित पुलक लिए 
एक मंगल उत्सव की अगवानी करने के लिए 
प्रकट होता गया 

कामनाओं के बहिर्गमन के साथ साथ कुएं का 
स्वरुप भी रूपांतरित होता गया 
अब कुएं के स्थान पर एक विस्तृत स्थल प्रकट हो गया 
अपने मौन में वो अनंत की रस माधुरी के स्वाद में 
डूब गया, तन्मयता के इन क्षणों को समेटते हुए कहानी 
ने उसकी चेतना को एक बहु-स्तरीय जाग्रति का संकेत दिया 

उसके लगा अब कहानी समाप्त हो गयी 
पर कहानी ने कहा 'मैं कभी समाप्त नहीं होती, क्योंकि में तुम्हारे भीतर 
रहती हूँ और तुम वो हो, जो हमेशा से है और हमेशा रहने वाला है '



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
८ अगस्त २०१३

Saturday, April 13, 2013

आज के आनंद की जय


१ 
कार्य उसका यही था, जुड़ना और जोड़ना 
इतने से कार्य के लिए कभी समय बहुत कम लगता था 
कभी समय बहुत अधिक लगता था 
उसको अपने घर से निकलते समय दादाजी ने कहा था 
की जोड़ने के लिए अपने आप से जुडा रहना आवश्यक है 
उसे सुनते समय हंसी आई थी 
पर कुछ ही महीनो में उसे अपने भीतर टूटन दिखाई देने लगी 
तो दादाजी की बात याद आई 

२ 
उसे याद आया दादी ने कहा था 
बहुत आगे जाते हुए अपने ध्यान रखना की अपने 
भीतर प्रवेश करने का द्वार खुला रहे 
उसे दादी की बात पर हंसी आई थी 
पर घर से इतने दूर 
अपना परिचय स्थितियों की हलचल में 
गुम  होते हुए देख कर उसने जब अपने भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया 
तो पता चला वो द्वार कहीं खो गया है 

३ 

उसने दादी की कहानियों में अपने बचपन को ढूँढने की कोशिश की 
तो पता चला, अब जिसकी तलाश करनी है 
वो बदला हुआ 'मैं' है 
जिसका बीते हुए मैं से सम्बन्ध होते हुए भी उतना 
गहरा सम्बन्ध नहीं है
 की जैसे दोनों एक ही घर में रहते हों 

४ 
उसे याद आया 
उसके परदादा 'आज' की महिमा गाते थे 
सब मिल कर 'आज के आनंद की जय' कहते थे 
उसने 'आज' से संबोधित होकर पूछा 
कहो अपना आनंद कहाँ छुपा रखा है 
'आज' ने कहा 
छुपाया मैंने नहीं है 
तुम मेरे 'आनंद' को तब देख पाओगे जब मेरी तरफ देखोगे 
मेरी तरफ देखने के लिए तुम्हें मुक्त होना होगा 
तुम तो पुरानी अनुभवों में से सहेजी हुयी टूटन से बंध  गए हो 
मेरी तरफ देखोगे तो ये बंधन भी टूट जायेंगे 
 
५ 
 
उसने अपने पुत्र से पूछा 
आज से जुडा रहने के लिए मैं क्या करू
शायद पुत्र ने कुछ कहा 
उसे सुनाई नहीं दिया 
दादाजी ही बोले 
तुम्हारा उत्तर न पुरानी पीढी के पास है 
न आने वाली पीढ़े के पास 
तुम्हारे सवाल तुमने ही बनाए हैं 
इनके वही उत्तर तुम्हें मान्य  होंगे 
जो तुम स्वयं बनाओगे 
 
६ 
 
नदी की समीप चलते हुए 
उसने अपने आप से पूछा 
'तो क्या मैं स्वयं ही बनाता हूँ 
बंधन अपने 
और 
है सामर्थ्य मुझमें ही 
अपने लिए मुक्ति सृजित करने की 
 
तो क्या 
सचमुच जो हूँ मैं 
परे हूँ 
बंधन  और मुक्ति के भी 
तो 
फिर हूँ कौन आखिर मैं?
७ 
'मैं' का प्रश्न उठा 
तो इस प्रश्न के साथ अनुसन्धान करते 
मनीषियों की एक 
आलोकित श्रंखला की तरंग उसे छू गयी 
 
मैं उतना ही तो नहीं 
जितना सोच सकता हूँ 
और सोच से परे का 
यह जो है 
मेरा विस्मित विस्तार 
इसे अपनी जेब में धर देने की यह बेवकूफी 
क्यूं नहीं छोड़ पाटा मैं 
 
हंसा वह 
कविता के रूप में ढल गयी थी उसकी कहानी 
 
कहा उसने 
अपने आप से 
मैं जो भी हूँ 
मेरा जीवन कहानी नहीं 
कविता है 
कविता 
जिसमें नए नए आयाम खुलने की सम्भावना 
कहानी से कहीं अधिक है 
विवरण हो या न हो 
भाव जो है 
अपनी पूरी गरिमा और सौन्दर्य के साथ 
उतर पाता है कविता में 
जीवन मेरा 
सूचना या सांख्यिकी नहीं 
संवेदन धारा है 
भाव का उजियारा है 
और इस जग का कण कण 
मुझे बहुत प्यारा है 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३  अप्रैल २० १ ३ 
 
 
 
 
 

Tuesday, April 2, 2013

पूर्ण पहचान के लिए


इस बार 
हो गयी उसकी करारी हार 
किनारे पर 
छूट गयी थी पतवार 
सहसा प्रश्न पूछने 
लगी मंझधार 
डूब ही जाओ ना 
क्या धरा है उस पार 

२ 
यहाँ उसे लगा 
धारा के अपनेपन में छल है 
बीच धार जो डूबा 
वो तो आँख से ओझल है 
सहसा समझा आया उसे 
बिना धरा के 
ना तो उसका आज है 
न उसका कल है 
३ 
फिर प्रेमसहित 
धारा से कहा उसने 
प्रस्ताव फिर कभी करूंगा स्वीकार 
आज तो चल निकलना है 
बना कर 
बाहों से पतवार 
किनारे पर 
छूट गया मुझसे 
अपने होने का सार 
अपनी पूर्ण पहचान के लिए 
जाना ही होगा 
मुझे उस पार 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२ अप्रैल २० १ ३ 

Monday, April 1, 2013

kahanee - रियर व्यू


 
 
मैं ही पकड़ कर ले गया था उसे 
पहली बार 
पहाड़ की उस चोटी पर 
जहाँ से सार शहर दीखता था 
हम दोनों बैठे बैठे सांझ ढलने के साथ साथ 
धीरे धीरे सारे शहर पर अंधेरे की चादर का बिछना 
चुप चाप देखते रहे 
फिर बिना कुछ कहे 
एकाएक उठे 
और बहुत दूर तक 
बिना कुछ बोले ही 
पहाडी से उतर आये 

२ 
फिर मैंने ही चुप्पी को तोड़ कर उससे पूछा था 
कैसा लगा ?
"क्या?"
उसने कहा तो मुझे आश्चर्य हुआ 
कुछ नहीं" मैंने कहा था तो ये सोच कर की 
वो आग्रह पूर्वक कुछ पूछेगा 
पर वो तो कुछ न बोला 
फिर हम पहाड़ से उतर का पार्किंग स्थल तक आ पहुंचे थे 
वो मुझसे बिना कुछ कहे अपनी गाडी में बैठ गया 
मैं भी अपनी गाडी में बैठा 
वो अब तक अपने में गम था 
३ 
मेरी अनदेखी करने पर उससे मन ही मन कुछ नाराजगी में 
मैंने गाडी स्टार्ट की और चल दिया 
दूर तक जाते हुए मैंने रियर व्यू मिरर से देखा 
वो वहां से हिला भी नहीं था 
 
४ 
मैं रुक गया 
एक मन हुआ 
उसको फ़ोन करके पूछूं की क्या बात है 
दूसरा मैं हुआ, फिर से लौट कर देखूं, हो क्या गया है 
फिर ख्याल आया, अगर कोइ मुश्किल होगी, तो वो खुद फ़ोन कर लेगा 
 
५ 
मैं चला आया 
घर आकर खाना खाकर अपने कमरे में लेट तो गया 
पर नींद आ नहीं रही थी 
सोच रहा था उसके बारे में 
वो इतना रहस्यमय क्यूं हो गया अचानक 
मुझे लगा वो अब तक वहीं बैठा होगा 
सहसा मैं घर से बाहर निकला 
गाडी उठाई 
दस मिनट की ड्राईव करके वही जा पहुंचा 
मेरा अंदाजा ठीक था 
वो गाडी वहीं थी 
पर मेरा मित्र वहा नहीं था 
हल्की चांदनी थी 
पहाड़ पर जाती पगडंडी साफ़ दिखाई दे रही थी 
न जाने क्यो मैं पहाड़ की चोटी की तरफ बढ़ने लगा 
 
६ 
कुछ दूर चलने पर सहसा एक पेड़ के पीछे से मुझे 
अपने नाम की पुकार सुनाई दी 
मैं चौंक कर पलटा 
वो ही था 
इस बार कुछ चहकता हुआ सा 
'कहाँ जा रहे हो?"
"तुम्हे देखने ही जा रहा था?
"क्यूं मुझे कभी देखा नहीं क्या ?"
उसने मेरी गंभीरता को नकार कर 
हलके फुल्के ढंग से पूछा 
७ 
सहसा उसके पीछे से हमारे मनोविज्ञान के प्रोफेसर 
और ७-८ दुसरे स्टूडेंट्स भी प्रकट हो गए 
 प्रोफेसर कहने लगे 
ये एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग था 
मेरा कहना था की इस तरह के व्यवहार की प्रतिक्रिया में 
तुम्हारा चिंतन इस तरह चलेगा की 
तुम अपने मित्र की खोज खबर लेने फिर से यहाँ तक आओगे 
अगर तुम्हारी जगह तुम्हारा मित्र होता 
तो लौट कर आने की बजाये आराम से सो रहा होता 
९ 
"तो इन दोनों में किसको अच्छा मनुष्य कहेंगे?"
ये प्रश्न हमारी कक्षा की सबसे सुन्दर लडकी ने पूछा था 
"तुम बताओ?" प्रोफेसर ने उसी से पूछ लिया 
तो वो बोली 
"मुझे लगता है 
अपनी परवाह न करने वालों के लिए परवाह करना 
क तरह की भावनात्मक कमजोरी है"
इस बात पर बहस छिड़ गयी 
१० 
अंत में प्रोफेसर ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा 
मनौवैज्ञानिक के लिए हर तरह का व्यवहार अध्ययन का 
विषय है 
अच्छी या बुरे की परिभाषा देना हमारा काम नहीं है 
हमारे लिए न कोइ अच्छा, ना कोइ बुरा 
 
११ 
प्रोफेसर ने तो कह दिया की 
हमारे लिए न कोइ अच्छा, न कोइ बुरा 
पर मुझे इस प्रयोग में मेरी अनुमति के बिना सम्मिलित  कर दिए 
जाने वाली बात बुरी लगी 
उस दिन के बाद मैं अपने मित्र से सीमित बोल-चाल रखने लगा 
मुझे लगा, उसने मेरे साथ धोखा किया 
मेरी भलमनहसत को बीच बाज़ार में खोल कर उसे मेरे ही 
खिलाफ इस्तेमाल कर दिया है 
ना जाने ये गुस्सा उस पर था या प्रोफेसर पर या उस सुन्दर लडकी पर 
पर उस दिन के बाद में उस पहाड़ पर पिछले २३  बरसों में कभी नहीं गया 
 
१ २ 
 
नौकरी के सिलसिले में शहर बदल गया 
दोस्तों का समूह बदल गया 
इस बीच वो स्टेज पर नाटक करते करते फिल्मों में पहुँच गया 
एक सफल अभिनेता बन गया 
मेरा बेटा कभी पूछता 
"पापा वो आपके साथ पढ़ते थे ना, तो मैं बात को टाल देता'
मेरे मन में उसके प्रति एक गुस्सा ना जाने कैसे इतने बरस बाद भी जमा रह गया था 
१३ 
इस बार अपने शहर लौटने के पीछे पुराने छात्रों के मिलन का 
विशेष उत्सव भी एक कारण था 
और उसकी नई फिल्म की सिल्वर जुबली भी हुयी थी 
बरसों बाद न जाने क्यूं पहाड़ की और कदम चल पड़े 
सुबह सुबह 
चोटी पर से देखा धीरे धीरे शहर जाग रहा था 
एक हलचल, एक शोर सा, पर सब कुछ जैसे किसी बड़े ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा था 
सहसा मुझे वो आता दिखाई दिया 
मैंने उसे अनदेखा करने की कोशिश की 
पर उसने ठीक सामने आकर हाथ बढ़ाया 
मुस्कुराते हुए बोला 
"न जाने क्यूं बरसों से इच्छा थी की एक बार तुमसे माफी मांग लूं"
उसके इन शब्दों के निकलते ही 
मैंने उसे गले लगा लिया 
१४ 
साथ साथ नीचे उतरते हुए 
उसने मुझे बताया की उसकी नई फिल्म का किरदार मेरी स्वभाव से मिलता जुलता है 
और मुझे से मिल कर वो उस किरदार की बारीकियों को बनाने में मदद लेना चाहता है 
बात सहजता से कही गयी 
पर मुझे लगा 
इतने बरस बाद उसने मुझे से जो माफी माँगी है 
वो भी उसके लिए कुछ और अर्जित करने का एक तरीका है 
 
उसने शायद मेरे विचार पढ़ लिए 
'सच्चा तो मैं पहले भी नहीं था 
मैं तब भी अभिनेता था 
आज अभी अभिनेता हूँ 
तुम औरों में अपने आदर्श ढूंढते रहते हो 
इस तरह उनको ठेस पहुंचे न पहुचे 
तुम्हे खुद ठेस जरूर पहुँचती है"
 
फिर मेरे कंधे पर हाथ रख कर उसने कहा 
"दुनिया जैसी है 
वैसी देखो 
अपनी सोच का रंग लगा कर देखोगे तो सब कुछ झूठ ही लगेगा'
 गाडी के पास पहुँचते पहुँचते शहर के कुछ लोगों ने उसे ऑटोग्राफ्स के लिए घेर लिया 
मैं अपनी गाडी में घर के लिए रवाना हो गया 
रियर व्यू मिरर से उसकी गाडी नहीं देख रहा था  
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २० १३ 
 
 
 

Tuesday, March 12, 2013

जो नहीं हैं अब


१ 
कुछ दिनों से अक्सर यूं होता रहा। पूजा करते करते यूं लगता जैसे कोइ पीछे खड़ा होकर देख रहा हो. 
पलट कर देखने पर कोइ दिखाई नहीं देता, पर ये अनुभूति की अभी अभी यहाँ कोइ था, बड़ी पक्की थी 
इतनी पक्की की इसकी चर्चा औरों से भी की, यह प्रश्न भी उछल आया की कहीं मेरा दिमाग अपना संतुलन तो नहीं खो रहा है 
इस तरह लगने की बारम्बारता इतनी अधिक मात्रा में, इतनी जल्दी पहले कभी हुयी न थी 
पर ये लगता था, की यह उपस्थिति जो मेरा ध्यान चाह रही है या मुझ पर ध्यान रख रही है, भली सी है,
मेरा नुक्सान नहीं करना चाहती वरन मेरे साथ इसका कोइ आत्मीय सम्बन्ध है 
यह भाव इतना प्रगाढ़ था की जैसे मैं इसे छू सकता हूँ, लगभग हर दिन, शायद दो या तीन सप्ताह से, इस तरह की अनुभूति की कोइ अदेखा, अशरीरी पर 'जाग्रत बोध' मेरी और समय समय पर देखता है 
अपनी दफ्तर में दो मित्रों से बात की की क्या उन्होंने ऐसा कभी अनुभव किया है, वे समझ ना पाए की मैं या कह रहा हूँ, अपनी पुत्री से भी इसकी चर्चा की, उसका कहना था कहीं मैं 'hallucinate' तो नहीं कर रहा हूँ, हम दोनों  'भूत' की सम्भावना उछाल कर भी मुस्कुराए . मैंने फिर कहा, ये उपस्थिति डराने वाली नहीं,
मैत्री पूर्ण है, पर क्यूं है, इसके बारे मैं कुछ पता नहीं चल रहा था 
उस दिन खुल कर बात होने के बाद मुझे लगा अब शायद वो उपस्थिति फिर से मेरी सजगता के घेरे में ना आये, पर ऐसा हुआ नहीं, अगले दिन भी पूजा कक्ष के ठीक बाहर से, जैसे कोइ मेरी और देखता प्रतीत हुआ 
पलट कर देखने पर कोइ दिखाई न दिया 

२ 
परिवार में एक मुखिया के परलोक गमन का अवसाद उस स्थल से दूर रह कर इस बात को 
खबर की तरह प्राप्त करने वालों के लिए बड़ा 'unreal' सा हो जाता है
उसकी वो तस्वीरें साथ होती हैं, जब वो जीवन की गरिमा का मधुर रस छलकाता था
उसकी सोच, उसके भाव और नन्हीं नन्ही बातो से जीवन का सौन्दर्य पान करने
वाली ललक का पुनरवलोकन करना उसकी उपस्थिति को सघन कर देता है
स्वीकार करने का क्रम, सबके लिए अलग अलग होता है, रह रह कर रुलाई सी फूटती है
उसमें प्यार और विवशता के साथ जीवन चक्र को समझते हुए भी न समझ पाने की कसक होती है
यादों की जानी पहचानी गलियों में बार बार यात्रा करके हम उस 'एक' अनाम कुछ को
बचाए रखने का प्रयास करते हैं .
जीवन के पार है क्या, यह प्रश्न भी उठ खड़ा होता है, ऐसे ही प्रश्न उठाती बिटिया ने कहा
'काश उन्हें ठीक से विदा तो कह पाती'?



इस यात्रा के साथ जो अनिश्चय है, वह जीवन के सौन्दर्य को बढाता है
हम जितना कुछ अपनी इन्द्रियों से जान पाते हैं, जिस तरह से जन्म मृत्यु का खेल अपनाते हैं,
इस खेल को बनाने वाला इन से परे है और इन्द्रियों के द्वारा समझ नहीं जा सकता 

उसी तरह सूक्ष्म स्तर पर घटित होने वाली घटनाओं का स्थूल जगत में
सर्वमान्य explanation हो नहीं सकता


आज सुबह 'अशोकजी' के स्वर को सुनते हुए आँख खुली,
जैसे कोइ दरवाजे के बाहर घंटी न बजने पर
आवाज दे रहा हो, स्वर बहुत स्पष्ट था, उठ गया,
पर ये भी स्पष्ट था की आवाज कहीं बाहर से नहीं आई, अपनी भीतर
से ही आई है
और उठते उठते जैसे किसी पहेली का हल सा मेरे सामने खिल गया
बिटिया के प्रश्न में इसकी कुंजी थी
शायद वो ही आये थे, अपनी और से विदा कहने, उस भली सी उपस्थिति के रूप में,
वह एक बोध, क्या उनकी ही चेतना का 'परावर्तन' था
जो नहीं हैं अब, देह रूप में।




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
1२ मार्च २ ० १ ३