१
कार्य उसका यही था, जुड़ना और जोड़ना
इतने से कार्य के लिए कभी समय बहुत कम लगता था
कभी समय बहुत अधिक लगता था
उसको अपने घर से निकलते समय दादाजी ने कहा था
की जोड़ने के लिए अपने आप से जुडा रहना आवश्यक है
उसे सुनते समय हंसी आई थी
पर कुछ ही महीनो में उसे अपने भीतर टूटन दिखाई देने लगी
तो दादाजी की बात याद आई
२
उसे याद आया दादी ने कहा था
बहुत आगे जाते हुए अपने ध्यान रखना की अपने
भीतर प्रवेश करने का द्वार खुला रहे
उसे दादी की बात पर हंसी आई थी
पर घर से इतने दूर
अपना परिचय स्थितियों की हलचल में
गुम होते हुए देख कर उसने जब अपने भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया
तो पता चला वो द्वार कहीं खो गया है
३
उसने दादी की कहानियों में अपने बचपन को ढूँढने की कोशिश की
तो पता चला, अब जिसकी तलाश करनी है
वो बदला हुआ 'मैं' है
जिसका बीते हुए मैं से सम्बन्ध होते हुए भी उतना
गहरा सम्बन्ध नहीं है
की जैसे दोनों एक ही घर में रहते हों
४
उसे याद आया
उसके परदादा 'आज' की महिमा गाते थे
सब मिल कर 'आज के आनंद की जय' कहते थे
उसने 'आज' से संबोधित होकर पूछा
कहो अपना आनंद कहाँ छुपा रखा है
'आज' ने कहा
छुपाया मैंने नहीं है
तुम मेरे 'आनंद' को तब देख पाओगे जब मेरी तरफ देखोगे
मेरी तरफ देखने के लिए तुम्हें मुक्त होना होगा
तुम तो पुरानी अनुभवों में से सहेजी हुयी टूटन से बंध गए हो
मेरी तरफ देखोगे तो ये बंधन भी टूट जायेंगे
५
उसने अपने पुत्र से पूछा
आज से जुडा रहने के लिए मैं क्या करू
शायद पुत्र ने कुछ कहा
उसे सुनाई नहीं दिया
दादाजी ही बोले
तुम्हारा उत्तर न पुरानी पीढी के पास है
न आने वाली पीढ़े के पास
तुम्हारे सवाल तुमने ही बनाए हैं
इनके वही उत्तर तुम्हें मान्य होंगे
जो तुम स्वयं बनाओगे
६
नदी की समीप चलते हुए
उसने अपने आप से पूछा
'तो क्या मैं स्वयं ही बनाता हूँ
बंधन अपने
और
है सामर्थ्य मुझमें ही
अपने लिए मुक्ति सृजित करने की
तो क्या
सचमुच जो हूँ मैं
परे हूँ
बंधन और मुक्ति के भी
तो
फिर हूँ कौन आखिर मैं?
७
'मैं' का प्रश्न उठा
तो इस प्रश्न के साथ अनुसन्धान करते
मनीषियों की एक
आलोकित श्रंखला की तरंग उसे छू गयी
मैं उतना ही तो नहीं
जितना सोच सकता हूँ
और सोच से परे का
यह जो है
मेरा विस्मित विस्तार
इसे अपनी जेब में धर देने की यह बेवकूफी
क्यूं नहीं छोड़ पाटा मैं
हंसा वह
कविता के रूप में ढल गयी थी उसकी कहानी
कहा उसने
अपने आप से
मैं जो भी हूँ
मेरा जीवन कहानी नहीं
कविता है
कविता
जिसमें नए नए आयाम खुलने की सम्भावना
कहानी से कहीं अधिक है
विवरण हो या न हो
भाव जो है
अपनी पूरी गरिमा और सौन्दर्य के साथ
उतर पाता है कविता में
जीवन मेरा
सूचना या सांख्यिकी नहीं
संवेदन धारा है
भाव का उजियारा है
और इस जग का कण कण
मुझे बहुत प्यारा है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल २० १ ३

