Saturday, April 13, 2013

आज के आनंद की जय


१ 
कार्य उसका यही था, जुड़ना और जोड़ना 
इतने से कार्य के लिए कभी समय बहुत कम लगता था 
कभी समय बहुत अधिक लगता था 
उसको अपने घर से निकलते समय दादाजी ने कहा था 
की जोड़ने के लिए अपने आप से जुडा रहना आवश्यक है 
उसे सुनते समय हंसी आई थी 
पर कुछ ही महीनो में उसे अपने भीतर टूटन दिखाई देने लगी 
तो दादाजी की बात याद आई 

२ 
उसे याद आया दादी ने कहा था 
बहुत आगे जाते हुए अपने ध्यान रखना की अपने 
भीतर प्रवेश करने का द्वार खुला रहे 
उसे दादी की बात पर हंसी आई थी 
पर घर से इतने दूर 
अपना परिचय स्थितियों की हलचल में 
गुम  होते हुए देख कर उसने जब अपने भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया 
तो पता चला वो द्वार कहीं खो गया है 

३ 

उसने दादी की कहानियों में अपने बचपन को ढूँढने की कोशिश की 
तो पता चला, अब जिसकी तलाश करनी है 
वो बदला हुआ 'मैं' है 
जिसका बीते हुए मैं से सम्बन्ध होते हुए भी उतना 
गहरा सम्बन्ध नहीं है
 की जैसे दोनों एक ही घर में रहते हों 

४ 
उसे याद आया 
उसके परदादा 'आज' की महिमा गाते थे 
सब मिल कर 'आज के आनंद की जय' कहते थे 
उसने 'आज' से संबोधित होकर पूछा 
कहो अपना आनंद कहाँ छुपा रखा है 
'आज' ने कहा 
छुपाया मैंने नहीं है 
तुम मेरे 'आनंद' को तब देख पाओगे जब मेरी तरफ देखोगे 
मेरी तरफ देखने के लिए तुम्हें मुक्त होना होगा 
तुम तो पुरानी अनुभवों में से सहेजी हुयी टूटन से बंध  गए हो 
मेरी तरफ देखोगे तो ये बंधन भी टूट जायेंगे 
 
५ 
 
उसने अपने पुत्र से पूछा 
आज से जुडा रहने के लिए मैं क्या करू
शायद पुत्र ने कुछ कहा 
उसे सुनाई नहीं दिया 
दादाजी ही बोले 
तुम्हारा उत्तर न पुरानी पीढी के पास है 
न आने वाली पीढ़े के पास 
तुम्हारे सवाल तुमने ही बनाए हैं 
इनके वही उत्तर तुम्हें मान्य  होंगे 
जो तुम स्वयं बनाओगे 
 
६ 
 
नदी की समीप चलते हुए 
उसने अपने आप से पूछा 
'तो क्या मैं स्वयं ही बनाता हूँ 
बंधन अपने 
और 
है सामर्थ्य मुझमें ही 
अपने लिए मुक्ति सृजित करने की 
 
तो क्या 
सचमुच जो हूँ मैं 
परे हूँ 
बंधन  और मुक्ति के भी 
तो 
फिर हूँ कौन आखिर मैं?
७ 
'मैं' का प्रश्न उठा 
तो इस प्रश्न के साथ अनुसन्धान करते 
मनीषियों की एक 
आलोकित श्रंखला की तरंग उसे छू गयी 
 
मैं उतना ही तो नहीं 
जितना सोच सकता हूँ 
और सोच से परे का 
यह जो है 
मेरा विस्मित विस्तार 
इसे अपनी जेब में धर देने की यह बेवकूफी 
क्यूं नहीं छोड़ पाटा मैं 
 
हंसा वह 
कविता के रूप में ढल गयी थी उसकी कहानी 
 
कहा उसने 
अपने आप से 
मैं जो भी हूँ 
मेरा जीवन कहानी नहीं 
कविता है 
कविता 
जिसमें नए नए आयाम खुलने की सम्भावना 
कहानी से कहीं अधिक है 
विवरण हो या न हो 
भाव जो है 
अपनी पूरी गरिमा और सौन्दर्य के साथ 
उतर पाता है कविता में 
जीवन मेरा 
सूचना या सांख्यिकी नहीं 
संवेदन धारा है 
भाव का उजियारा है 
और इस जग का कण कण 
मुझे बहुत प्यारा है 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३  अप्रैल २० १ ३ 
 
 
 
 
 

Tuesday, April 2, 2013

पूर्ण पहचान के लिए


इस बार 
हो गयी उसकी करारी हार 
किनारे पर 
छूट गयी थी पतवार 
सहसा प्रश्न पूछने 
लगी मंझधार 
डूब ही जाओ ना 
क्या धरा है उस पार 

२ 
यहाँ उसे लगा 
धारा के अपनेपन में छल है 
बीच धार जो डूबा 
वो तो आँख से ओझल है 
सहसा समझा आया उसे 
बिना धरा के 
ना तो उसका आज है 
न उसका कल है 
३ 
फिर प्रेमसहित 
धारा से कहा उसने 
प्रस्ताव फिर कभी करूंगा स्वीकार 
आज तो चल निकलना है 
बना कर 
बाहों से पतवार 
किनारे पर 
छूट गया मुझसे 
अपने होने का सार 
अपनी पूर्ण पहचान के लिए 
जाना ही होगा 
मुझे उस पार 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२ अप्रैल २० १ ३ 

Monday, April 1, 2013

kahanee - रियर व्यू


 
 
मैं ही पकड़ कर ले गया था उसे 
पहली बार 
पहाड़ की उस चोटी पर 
जहाँ से सार शहर दीखता था 
हम दोनों बैठे बैठे सांझ ढलने के साथ साथ 
धीरे धीरे सारे शहर पर अंधेरे की चादर का बिछना 
चुप चाप देखते रहे 
फिर बिना कुछ कहे 
एकाएक उठे 
और बहुत दूर तक 
बिना कुछ बोले ही 
पहाडी से उतर आये 

२ 
फिर मैंने ही चुप्पी को तोड़ कर उससे पूछा था 
कैसा लगा ?
"क्या?"
उसने कहा तो मुझे आश्चर्य हुआ 
कुछ नहीं" मैंने कहा था तो ये सोच कर की 
वो आग्रह पूर्वक कुछ पूछेगा 
पर वो तो कुछ न बोला 
फिर हम पहाड़ से उतर का पार्किंग स्थल तक आ पहुंचे थे 
वो मुझसे बिना कुछ कहे अपनी गाडी में बैठ गया 
मैं भी अपनी गाडी में बैठा 
वो अब तक अपने में गम था 
३ 
मेरी अनदेखी करने पर उससे मन ही मन कुछ नाराजगी में 
मैंने गाडी स्टार्ट की और चल दिया 
दूर तक जाते हुए मैंने रियर व्यू मिरर से देखा 
वो वहां से हिला भी नहीं था 
 
४ 
मैं रुक गया 
एक मन हुआ 
उसको फ़ोन करके पूछूं की क्या बात है 
दूसरा मैं हुआ, फिर से लौट कर देखूं, हो क्या गया है 
फिर ख्याल आया, अगर कोइ मुश्किल होगी, तो वो खुद फ़ोन कर लेगा 
 
५ 
मैं चला आया 
घर आकर खाना खाकर अपने कमरे में लेट तो गया 
पर नींद आ नहीं रही थी 
सोच रहा था उसके बारे में 
वो इतना रहस्यमय क्यूं हो गया अचानक 
मुझे लगा वो अब तक वहीं बैठा होगा 
सहसा मैं घर से बाहर निकला 
गाडी उठाई 
दस मिनट की ड्राईव करके वही जा पहुंचा 
मेरा अंदाजा ठीक था 
वो गाडी वहीं थी 
पर मेरा मित्र वहा नहीं था 
हल्की चांदनी थी 
पहाड़ पर जाती पगडंडी साफ़ दिखाई दे रही थी 
न जाने क्यो मैं पहाड़ की चोटी की तरफ बढ़ने लगा 
 
६ 
कुछ दूर चलने पर सहसा एक पेड़ के पीछे से मुझे 
अपने नाम की पुकार सुनाई दी 
मैं चौंक कर पलटा 
वो ही था 
इस बार कुछ चहकता हुआ सा 
'कहाँ जा रहे हो?"
"तुम्हे देखने ही जा रहा था?
"क्यूं मुझे कभी देखा नहीं क्या ?"
उसने मेरी गंभीरता को नकार कर 
हलके फुल्के ढंग से पूछा 
७ 
सहसा उसके पीछे से हमारे मनोविज्ञान के प्रोफेसर 
और ७-८ दुसरे स्टूडेंट्स भी प्रकट हो गए 
 प्रोफेसर कहने लगे 
ये एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग था 
मेरा कहना था की इस तरह के व्यवहार की प्रतिक्रिया में 
तुम्हारा चिंतन इस तरह चलेगा की 
तुम अपने मित्र की खोज खबर लेने फिर से यहाँ तक आओगे 
अगर तुम्हारी जगह तुम्हारा मित्र होता 
तो लौट कर आने की बजाये आराम से सो रहा होता 
९ 
"तो इन दोनों में किसको अच्छा मनुष्य कहेंगे?"
ये प्रश्न हमारी कक्षा की सबसे सुन्दर लडकी ने पूछा था 
"तुम बताओ?" प्रोफेसर ने उसी से पूछ लिया 
तो वो बोली 
"मुझे लगता है 
अपनी परवाह न करने वालों के लिए परवाह करना 
क तरह की भावनात्मक कमजोरी है"
इस बात पर बहस छिड़ गयी 
१० 
अंत में प्रोफेसर ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा 
मनौवैज्ञानिक के लिए हर तरह का व्यवहार अध्ययन का 
विषय है 
अच्छी या बुरे की परिभाषा देना हमारा काम नहीं है 
हमारे लिए न कोइ अच्छा, ना कोइ बुरा 
 
११ 
प्रोफेसर ने तो कह दिया की 
हमारे लिए न कोइ अच्छा, न कोइ बुरा 
पर मुझे इस प्रयोग में मेरी अनुमति के बिना सम्मिलित  कर दिए 
जाने वाली बात बुरी लगी 
उस दिन के बाद मैं अपने मित्र से सीमित बोल-चाल रखने लगा 
मुझे लगा, उसने मेरे साथ धोखा किया 
मेरी भलमनहसत को बीच बाज़ार में खोल कर उसे मेरे ही 
खिलाफ इस्तेमाल कर दिया है 
ना जाने ये गुस्सा उस पर था या प्रोफेसर पर या उस सुन्दर लडकी पर 
पर उस दिन के बाद में उस पहाड़ पर पिछले २३  बरसों में कभी नहीं गया 
 
१ २ 
 
नौकरी के सिलसिले में शहर बदल गया 
दोस्तों का समूह बदल गया 
इस बीच वो स्टेज पर नाटक करते करते फिल्मों में पहुँच गया 
एक सफल अभिनेता बन गया 
मेरा बेटा कभी पूछता 
"पापा वो आपके साथ पढ़ते थे ना, तो मैं बात को टाल देता'
मेरे मन में उसके प्रति एक गुस्सा ना जाने कैसे इतने बरस बाद भी जमा रह गया था 
१३ 
इस बार अपने शहर लौटने के पीछे पुराने छात्रों के मिलन का 
विशेष उत्सव भी एक कारण था 
और उसकी नई फिल्म की सिल्वर जुबली भी हुयी थी 
बरसों बाद न जाने क्यूं पहाड़ की और कदम चल पड़े 
सुबह सुबह 
चोटी पर से देखा धीरे धीरे शहर जाग रहा था 
एक हलचल, एक शोर सा, पर सब कुछ जैसे किसी बड़े ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा था 
सहसा मुझे वो आता दिखाई दिया 
मैंने उसे अनदेखा करने की कोशिश की 
पर उसने ठीक सामने आकर हाथ बढ़ाया 
मुस्कुराते हुए बोला 
"न जाने क्यूं बरसों से इच्छा थी की एक बार तुमसे माफी मांग लूं"
उसके इन शब्दों के निकलते ही 
मैंने उसे गले लगा लिया 
१४ 
साथ साथ नीचे उतरते हुए 
उसने मुझे बताया की उसकी नई फिल्म का किरदार मेरी स्वभाव से मिलता जुलता है 
और मुझे से मिल कर वो उस किरदार की बारीकियों को बनाने में मदद लेना चाहता है 
बात सहजता से कही गयी 
पर मुझे लगा 
इतने बरस बाद उसने मुझे से जो माफी माँगी है 
वो भी उसके लिए कुछ और अर्जित करने का एक तरीका है 
 
उसने शायद मेरे विचार पढ़ लिए 
'सच्चा तो मैं पहले भी नहीं था 
मैं तब भी अभिनेता था 
आज अभी अभिनेता हूँ 
तुम औरों में अपने आदर्श ढूंढते रहते हो 
इस तरह उनको ठेस पहुंचे न पहुचे 
तुम्हे खुद ठेस जरूर पहुँचती है"
 
फिर मेरे कंधे पर हाथ रख कर उसने कहा 
"दुनिया जैसी है 
वैसी देखो 
अपनी सोच का रंग लगा कर देखोगे तो सब कुछ झूठ ही लगेगा'
 गाडी के पास पहुँचते पहुँचते शहर के कुछ लोगों ने उसे ऑटोग्राफ्स के लिए घेर लिया 
मैं अपनी गाडी में घर के लिए रवाना हो गया 
रियर व्यू मिरर से उसकी गाडी नहीं देख रहा था  
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २० १३