"बेख़ौफ़ कोइ रास्ता चलने के लिए दे"
यह गरिमायुक्त छटपटाहट वाला संबोधन है 'दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे'
ये दरवाज़ा सुरक्षा बढ़ाने, बाहर से भीतर आने, घर में रमें रहने के लिए नहीं माँगा जा रहा है, इसे निकलने के लिए मांगा जा रहा है
पर निकल कर क्या करना है ?
क्या घर की सुरक्षित चहारदीवारी गयी तो रास्ते में सुरक्षा का दर घेर लेगा?
नहीं, शायर स्वतंत्रता का उत्सव मनाने के लिए क्षुद्रता तोड़ने का आव्हान कर रहा है
बात है ऐसे रास्ते पर चलने की, जहां डर नहीं है.
"बेख़ौफ़ कोइ रास्ता चलने के लिए दे"
फिर एक अध्यात्म संस्कार वाला मन शायद इस शेर में शरण लेने वाली बात पकड़ ले
क्योंकी शायर अपनी और से किसी खास रास्ते या विशेष ख्वाहिश को पूरा करने के लिए नहीं कह रहा है ,
उसमें श्रद्धा है की जिससे मांग रहा है 'बेख़ौफ़ रास्ता ',
उसे मालूम है की किस रास्ते पर चलने मेरे लिए मुनासिब होगा
"दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे बेख़ौफ़ कोई रास्ता चलने के लिए दे '
इस ग़ज़ल के दूसरे शेर में संकेत मिल रहा है की रास्ते का गंतव्य क्या है 'आँखों को अता
ख्वाब किये शुक्रिया लेकिन, पैकर भी कोई ख्वाब में ढलने के लिए दे'
एक vague और असपष्टता लेकर काम नहीं बनता
शायर ख्वाबों को ढालने के लिए सांचे की दरख्वास्त भी विराट से कर रहा है
इस ग़ज़ल में शायर के सामने जीवन को सीमित सा करने वाली एक इकाई "काल" का भी बोध है
वह देख रहा है किए वक्त को लेकर लोगों के पास कितनी शिकायतें हैं,
वह देख रहा है काल को कोठरी बताने वाले काल की दीवारों से बार बार टकराते हैं
टकराने का सबसे अधिक विकराल और हताशा वाला स्वरुप वह है
जिसमें कोइ दीवार से अपना सर ही दे मारे
वरना कोई हाथ से धक्का दे, लात मारे,
सर दे मारना तो इंतहा है,
जहां शायर निज़ाम साब स्वयं समयातीत से साक्षी से देख रहे हैं,
ये पीढी , पिछली पीढी, आने वाली पीढी सब वक्त की दीवार से सर फोड़ रहे हैं ये जो जद्दोजहद है,
ये जो कश्मकश है -इसके समानान्तर कहीं कबीर सुनाई दे जाते हैं
'फूले फूले चुन लिए, काल हमारी बार'
ये जो कलियों की पुकार है, वही भाव भूमि इस शेर में मिलती हैं '
"सब वक्त की दीवार से सर फोड़ रहे हैं, रोज़न ही कोई भाग निकलने के लिए दे '
निज़ाम साब वक्त की दीवार से बाहर यानि कालबद्धता से पर ले जाने वाले
छिद्र(रोज़न) की परिकल्पना जब पाठक के साथ बांटते हैं
तो किसी सिरे पर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से निथार कर निकले मन की वाणी सुनाई देती है
'सूली ऊपर सेज पिया की। ." वाले मीरा बाई की पंक्ति अलग परिवेश, भिन्न सन्दर्भ में उभर आती है
'प्रेम दीवानी मीरा बाई के दर्द को कोइ जाना हैं,- हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय'
कृष्ण ही जीवन था, जीवन की झांकी पाने, इसके विस्तृत स्वरुप को अपनाने की अकुलाहट
शायर शीन कॉफ निज़ाम की रचनाओं में बार बार दिखाई देती हैं
यदि मैं उन्हें आधुनिक युग का एक कुशल भक्त कवि कहूँ तो उन्हें भी शायद स्वीकार्य नहीं होगा
वे चतुराई से अपने श्रद्धा प्रसूत संस्कारी मन को कला-कौशल के सूक्ष्म कलेवर से ढांप कर रखते आये हैं
प्रेमी को इस तरह का दुराव -छिपाव प्रेम की पावनता को बरकरार रखने के लिए जरूरी लग सकता है
ये कहना जरूरी है की शायर निज़ाम के लिए भारतीय परंपरा ज्ञान परंपरा है,
सत्य के अन्वेषण के ऐसी परंपरा है जो हिन्दू संस्कार -संस्कृति तक ही महदूद नहीं,,
उनके साथ उनकी बात को शिद्दत से समझने के लिए कहीं इस्लामी तहज़ीब के पारम्परिक कथानक
एक नया आयाम उद्घाटित करते हैं
तो ईसाई मत के आदम और हव्वा वाले बात भे इस ग़ज़ल के अंतिम शेर में आई है
अपनी कल्पना शक्ति के लिए सृजन की सामर्थ्य की प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं
'तखईल को तख़लीक़ की तौफीक अता कर
फिर पहलू से एक चीज निकलने के लिए दे'
पहलू से एक चीज़ निकलने' वाले सन्दर्भ का मूल चाहे जो हो
पढ़ने वाला इस अभिव्यक्ति में अपने लिए कुछ नया अर्थ बरामद कर सकता है.
यह universality जो पुराने सन्दर्भों को आधुनिक स्थितियों के अनुरूप न्यूनता प्रदान करते हैं
-निज़ाम की शायरी की खूबी है
और इस तरह उनकी शायरी हमारे लिए एक नित्य-नूतन धरोहर बन जाती है
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अशोक व्यास