कहानी
कहानी ने उसे वहां ढूँढा जहाँ उसने ये मान लिया था की वो सबकी पहुँच से परे आ गया है
पहले तो सूर्य की एक किरण अचानक आकर उसके भाल पर तिलक कर गयी
उसके भीतर के उजियारे ने जैसे बाहरी जगत के उजियारे से एक मान्यता पाई हो
फिर कहानी ने उसकी स्मृतियों का हाथ पकड़ कर उसे ऐसे काल में उतरना सिखाया
जहाँ उतर कर लौट न पाने के डर से वो पहले कभी गया नहीं था
एक वो कुआँ था, जिसमें उसकी क्षुद्र कामनाएं छुप कर रहती थीं
उसे भय था वहां जाने पर वे फिर उसे घेर लेंगी
पर ऐसे हुआ नहीं
सब कामनाओं का स्वरुप बदल गया था
उनके भीतर अब उसे ममता की झलक दिखाई दी
हमने तुम्हारा साथ तुम्हारे कल्याण और आत्म -विकास के लिए ही किया था
तुम हमें अपनी करुनामय दृष्टि से देख कर मुक्त करों
अपने ही अतीत से झांकती क्षुद्र कामनाओं से यह प्रार्थना सुन कर
वह आश्चर्यचकित था
उसने सहज प्रेम, विनम्रता और श्रद्धा के साथ उनकी और देखा
कामनाएं उसके देखते देखते कुएं से लुप्त होने लगीं
उजियारे विस्तार अपनी प्रफुल्लित पुलक लिए
एक मंगल उत्सव की अगवानी करने के लिए
प्रकट होता गया
कामनाओं के बहिर्गमन के साथ साथ कुएं का
स्वरुप भी रूपांतरित होता गया
अब कुएं के स्थान पर एक विस्तृत स्थल प्रकट हो गया
अपने मौन में वो अनंत की रस माधुरी के स्वाद में
डूब गया, तन्मयता के इन क्षणों को समेटते हुए कहानी
ने उसकी चेतना को एक बहु-स्तरीय जाग्रति का संकेत दिया
उसके लगा अब कहानी समाप्त हो गयी
पर कहानी ने कहा 'मैं कभी समाप्त नहीं होती, क्योंकि में तुम्हारे भीतर
रहती हूँ और तुम वो हो, जो हमेशा से है और हमेशा रहने वाला है '
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ अगस्त २०१३
