Saturday, August 30, 2014

बात कुछ भी न हुई


वह एक अजीब सी उहापोह में फंसा था, सारा जीवन उसकी हथेली पर धरा था 
जिसमें उसे कभी सागर दिखाई पड़ता, कभी आकाश तो कभी जंगल, वो अपने आप में 
गुम था, पर उसे ऐसा कोई सिरा  नहीं मिल रहा था जहाँ से चल कर वो अपने आपको ढूंढ पाये 
उसने सोचों से थक कर सोचना छोड़ दिया 
वो अपने आप में बंद हो गया
 न कोई नया विचार 
न पुराने विचारों की कतार 
एक शून्य था 
शून्य जिसमें न जाने कैसे कोई एक चीख ठहर गयी थी 
और यह चीख रह रह कर उसे छू जाती 
अब उसने अपना सारा ध्यान इस चीख के पीछे छुपी कहानी को सुलझाने में लगा दिया 
वह शांत होकर इस चीख का रंग रूप देख रहा था 
अब उसे लगा चीखें भी कितनी मासूम होती हैं 
इनके भीतर एक भोलापन होता है 
नासमझी का शिकार ये चीख न जाने कैसे धीरे धीरे उसके साथ
 ध्यान मगन होने का खेल खेलते खेलते 
सुन्दर और मधुर हो चली थी 
अब उसे साफ़ दिख रहा था इस चीख का बीज उसने वहां से उठाया था  
जहा उसे अपने चेहरे में भ्रम की परछाई दिखाई दे रही थी 

चीख ने खुद कहा मैं तुम्हारा सच नहीं हूँ 

तुम अपने सत्य के साथ होकर कितने बलशाली और गौरवशाली हो जाते हो 

चीख ने यह कह कर उसे प्रणाम किया 
वह मौन के अनंत शिखर में सम्माहित हो गया 

बात कुछ भी न हुई पर कुछ बन गया 
दिखाई कुछ भी न दिया पर वह संवर गया 
अपने नए रूप के साथ जब उसने आँखें खोली 
तो सारी दुनिया को बदला हुआ पाया 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० अगस्त २०१४ 

Saturday, August 16, 2014

सूरज का अंश


लिख कर कोई पुरस्कार थोड़े ही मिलना है, लिख कर कोई पैसे थोड़े ही कामना है" कुछ इस तरह की बातें उसके पास कई बार सुनने को मिलती थी 
आज वो नहीं है 
उसके शब्दों में जो स्पंदन हैं, उन शब्दों में उसकी धड़कने अब भी सुनाई देती हैं, तो क्या लिख लिख कर वो अपने लिए अमर होने के द्वार खोल रहा था? मैंने सोचा और उसकी पुरानी डायरी में उसके हाथों लिखी ये कहानी दिखाई दी, जिसका अंत निष्कर्षात्मक था 
"वो जब पहाड़ की छोटी पर पहुंचा तब उसके मन में अपूर्व शांति थी, उस शांति की सघन अनुभूति लेकर वह 
वहीं बैठ गया, सूर्यास्त होने से पहले क्षितिज पर ललाई का खेल उभर रहा था, रंगों के बीच सामंजस्य बिठाने वाले की कला पर मुग्ध वह मुस्कुराया।
पहाड़ से नीचे उतरते हुए उसे लगा, जो दीखता है वह सच नहीं होता, सूर्यास्त होते दिखाई देता है पर सूरज हमेशा बना रहता है, कभी अस्त नहीं होता, मैं भी कभी अस्त नहीं होने वाला हूँ क्योंकि मैं सूरज का अंश हूँ"

मैं उसके शब्दों में झनझनाते जीवन की तरंगों के स्पर्श से तन्मय हो चला था 
डायरी बंद करके जब अपने चारों और देखा तो बोध हुआ शाम हो चली थी, यही वो वक्त था जब अक्सर सुधांशु के कदम मेरे कमरे की ओर बढ़ते थे, घंटी थी, पर उसे द्वार खटखटाना ही अच्छा लगता था, कारण पूछने पर उसने बताया की संवाद के द्वार खोलते हुए वो इलेक्ट्रिसिटी को बीच में नहीं लाना चाहता, दरवाजे पर दस्तक देने वाले मेरे हाथ द्वारा उत्पन्न ध्वनि में मेरा जीवन सीधे सीधे तुमसे जुड़ता है 
मैं चाहता हूँ, जीवन जीवन से जुड़े बिना किसी कृत्रिमता के. उसे दरवाजा खटखटाना घंटी बजाने की अपेक्षा अधिक शुद्ध लगता था, इस बात पर मित्रों के बीच मैंने भी उसका मजाक बनाया था पर आज मेरे कान उसकी दस्तक का स्वर सुन रहे थे जिसने लिखा था 'मैं कभी अस्त नहीं होने वाला हूँ "

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१६ अगस्त २०१४