Sunday, October 20, 2013

अधूरी कहानी बंद करो


इस बार तो पूरा मोहल्ला उसके घर के बाहर नारे बाज़ी करने चला आया था, उनके हाथों में तख्तियां भी थीं,
जिन पर नारे लिखे थे, कुछ लोग जोर जोर से उन नारों का सामूहिक स्वर में उच्चारण भी कर रहे थे 
"बंद करो', "बंद करो, अधूरी कहानी बंद करो'
सबके साथ आये शिष्ट मंडल में से चार लोग उससे बात करने आगे आये तो वो भी शिष्टता के साथ उनकी सुनने लगा. सबको शिकायत थी की वो इतनी अच्छी कहानियां लिखता है पर उन कहानियों में अंत तो होता ही नहीं, बस्ती वालों की शिकायत थी की अधूरी कहानियों के कारण कई लोगों की नींद उड़ गयी है और बस्ती में एक तरह की उदासी है, उस उदास लहर के लिए सब उसे ही दोषी ठहरा रहे थे 

२ 

उसे समझ में नहीं आ रहा था की वो अपनी सफाई में क्या कहे 
कुछ भी कहने के बजाये उसने कहा 'इस बार वो उनके लिए एक पूरी कहानी लिखेगा'
उनके चेहरे पर तसल्ली थोड़ी ही देर रही, क्योंकि उसने पूछा, पूरी कहानी के योग्य 
कोइ पूरा व्यक्तित्व उसे बताने का ज़िम्मा बस्ती वालों को 

३ 

सब सोचने लगे तो हर किसी में कमियां दिखाई दी 
हार मानते मानते शिष्ट मंडल के एक सदस्य ने कहा, कहीं में कल्पना का प्रयोग भी तो किया जा सकता है 
ठीक है, मैं प्रयास करूंगा 
उसने कहा 
फिर पूरे चौदह बरस तक उसने कोइ कहानी नहीं लिखी 

इस बार जब उसके कलम चलने लगी  तो बस्ती में चर्चा हुई, शायद उसे कोइ पूरा व्यक्तित्व मिल गया है 
सब अधीरता से उसकी कहानी की प्रतीक्षा कर रहे थे 

जिस दिन कहानी  नदी में उतरी तो दूर दूर तक खुशबू फ़ैल गयी 
कहानी की कोइ नापी तुली संरचना नहीं थी, इसमें लचीलापन था 
हर किसी को इस कहानी में अपना अक्स दिखलाई दे रहा था 

४ 

लोग प्रतिक्रिया करने में संकोच कर रहे थे 
पर चर्चा के केंद्र में उसकी कहानी ही थी 

कहानी उत्सव में उसने मंच से कहानी का रहस्य प्रकट करते हुए कहा 
"इस कहानी का अपना कोइ आग्रह नहीं, यह एक तरह से निराकार को आकार देने की 
कोशिश है और इस कहानी का विस्तार देखने वाली की दृष्टि का सहारा लेकर अपनी सीमा को निर्धारित करता है, इसमें कुछ ऐसे पात्र हैं जो पूरी खुले पण से विभिन्न दृष्टियों के सांचे में ढल लजाने को प्रस्तुत हैं'

ये पात्र उसे कहाँ मिले, जब दर्शकों ने ये प्रश्न उठाया तो वह मुस्कुराया, चौदह साल के वनवास के बाद 
ये पात्र राम के साथ अयोध्या लौटे थे 
और काल की सीमाओं को लांघ कर मेरे पास राम का सन्देश लेकर आये'

और राम का सन्देश क्या है ? पछा गया तो वह फिर एक कोमल मुस्कराहट के साथ बोल "राम का सन्देश सुनने सुनाने के लिए हमें अपने सीमित आकारों से परे की चेतना को स्वीकार करना आवश्यक है'

मेरी कहानी उसी चेतना का आव्हान करने का एक विनम्र प्रयास है 

तालियों की गडगडाहट से बस्ती का सभागार गूँज उठा 
सबने नए सिरे से पूरे कहानी के स्त्रोत को जान लिया 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२० अक्टूबर २०१३ 

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