सारे देशों के कलाकार मिल कर
इस विषय पर विमर्श कर रहे थे.
कुछ ने कहा "भोजन में ही रस है"
कुछ ने बताया 'सुंदरता में रस है "
"वनस्पतियो में रस है "
"रस है कल्पना में "
फिर एक ने पूछा,
"ये रस है क्या ?"
किसी ने कहा "रस माने आनंद"
"आनंद तो श्रद्धा और प्रेम से ही आएगा"
"प्रेम कहाँ से आये ?"
"प्रेम तो हमारे भीतर है "
"पर हमारे भीतर तो नफरत भी है "
एक ने कहा
"रस वो है
जो हमारे भीतर के प्रेम को प्रकट करवाये "
इससे सब सहमत हो गए
२
लोग अपने-अपने देश लौट गए
प्रयोगशालाओं में ऐसे रस का विकास किया गया
जिससे प्रेम प्रकट हो "
सबने उस "रस" पर अपनी अपनी संस्कृति ,
अपने अपने देश की छाप लगा दी
अगली बार "रस यात्रा " का सम्मलेन हुआ तो उसे "शांति सम्मलेन" कहा गया
सब अपने अपने देश से लाये गए "प्रेमवर्धक रस" की महिमा गाते रहे
खींचतान में रस का असर जाता रहा
शांति का संगीत अहंकार और अधिकार की थाप में खो गया
४
पेड़ों के नीच बैठे मौनधारियों ने सुना
विश्व सम्राट ने सभी को रस उत्पादन की विशिष्ट क्षमता दी है
ऊंचे पहाड़ों पर गुफाओं में बैठे मनस्वियों ने सुना
"प्रेम किसी एक की बपौती नहीं है "
हवाओं ने सन्देश सुनाया "हर मनुष्य विशिष्ट है "
जीवन का लक्ष्य है
"रससृष्टि करो
प्रेमवृष्टि करो
आनंद हो अनवरत
ऐसी दृष्टि करो"
अशोक व्यास,
न्यूयार्क, अमेरिका
(लिखा गया , ८ दिसंबर २००८, फ्लशिंग, न्यू यॉर्क स्थित
की फ़ूड के बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा करते हुए)

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